ताकत का घमंड मसल दिए जाने से ही चूर होता है. बिना हार-जीत वाली लड़ाई खींचने से नहीं. जहां वार लंबा हुआ, ताकतवर को लगता है जीत हमारी होगी. वो गलतफहमी भी पाल सकता है. यही अमेरिका के साथ होता आया है. वियतनाम में घुसे राष्ट्रपति आइजनहावर. 1953 में. और निकले रिचर्ड निक्सन. 1973 में पेरिस डील के साथ. इस बीच जॉन एफ केनेडी, लिंडन जॉनसन लड़ते रहे. इसी गुमान में कि यूएस आर्मी को नॉर्थ कोरियन गुरिल्ला क्या हरा पाएंगे? रिजल्ट उलटा निकला. गेराल्ड आर फोर्ड 1975 में वाइट हाउस में बैठ कर साउथ वियतनाम का पतन देखते रहे जिसकी मदद के लिए अमेरिकी मिलिट्री एडवाइजर्स का पहला जत्था 1953 में निकला था. फिर अफगानिस्तान में तालिबान जैसी मिलिशिया से जॉर्ज बुश और बराक ओबामा 17 साल तक लड़ते रहे. जो बाइडन को लगा कि ये लड़ाई पैसे की बर्बादी और सैनिकों की हत्या के अलावा कुछ नहीं तो आर्मी वापस बुला ली. यही हाल डोनाल्ड ट्रंप का है. ईरान में कूदे कैसे थे या नेतन्याहू ने कुदाया कैसे था, ये सब हमने देखा. आज बड़े बेआबरू होकर डील खोज रहे हैं. एआई से बना वीडियो पोस्ट कर रहे हैं जिसमें ईरान रिवोल्यूशनरी आर्मी के जहाज समंदर की सतह पर हैं. उधर अमेरिकी मीडिया अरबों डॉलर के नुकसान, महंगाई से त्राहिमाम और एफ-35 जैसे अभेद्द फाइटर जेट्स के उड़ाए जाने का दावा कर रही है.




