प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा भारत की लुक-ईस्ट नीति को नई गति देने वाला निर्णायक कदम साबित हुई। तीन दिन की इस यात्रा में भारत और इंडोनेशिया के बीच 14 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिन्होंने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, खाद्य सुरक्षा, अंतरिक्ष, शिक्षा, दूरसंचार, अनुसंधान तथा नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग का नया अध्याय खोल दिया। लेकिन इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण रहा सबांग बंदरगाह के संयुक्त विकास पर सहमति, जिसने हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य के सामरिक समीकरणों में भारत की उपस्थिति को कहीं अधिक प्रभावशाली बना दिया है।
मलक्का जलडमरूमध्य विश्व व्यापार की सबसे व्यस्त समुद्री धमनियों में से एक है। वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। पूर्वी एशिया की अर्थव्यवस्थाओं और विशेष रूप से चीन की ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में सबांग बंदरगाह के विकास में भारत की भागीदारी केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक निवेश भी है। यह बंदरगाह भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के निकट स्थित है। दोनों परियोजनाएं मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री निगरानी, रसद क्षमता और रणनीतिक पहुंच को कई गुना मजबूत कर सकती हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने मुक्त, सुरक्षित और शांतिपूर्ण इंडो पैसिफिक की आवश्यकता पर बल देते हुए आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता की साझा नीति दोहराई। यह संदेश केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक स्पष्ट रणनीतिक संकेत भी था कि भारत और इंडोनेशिया समुद्री सुरक्षा तथा नियम आधारित व्यवस्था के पक्षधर हैं।
इस यात्रा का सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो ने लगभग एक हजार वर्ष पुराने प्रम्बानन मंदिर परिसर का संयुक्त दौरा किया। भारत ने इस विश्व धरोहर मंदिर के संरक्षण और पुनर्स्थापन में सहयोग देने की घोषणा की। यह सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का निर्णय ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के हजारों वर्ष पुराने सभ्यतागत संबंधों को आधुनिक कूटनीति से जोड़ने का सशक्त प्रयास भी है। सांस्कृतिक विश्वास और सामरिक साझेदारी का यह संतुलन भारत की विदेश नीति की नई पहचान बनता दिखाई दे रहा है।
इंडोनेशिया की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को मिला विशेष सम्मान भी दोनों देशों के बदलते रिश्तों की गहराई का संकेत देता है। आगमन और प्रस्थान दोनों अवसरों पर लड़ाकू विमानों द्वारा उनके विमान को सुरक्षा प्रदान करना तथा स्वयं राष्ट्रपति का हवाई अड्डे तक पहुंचकर अगवानी करना और विदाई देना इस बात का प्रमाण है कि जकार्ता नई दिल्ली को अपने सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में शामिल कर रहा है।
इंडोनेशिया में नई सामरिक नींव रखने के बाद प्रधानमंत्री मोदी अब ऑस्ट्रेलिया पहुंचे हैं, जहां अगले चरण की कूटनीति का केंद्र महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला बनने जा रहे हैं। देखा जाये तो बदलते वैश्विक परिदृश्य में आधुनिक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल सैन्य शक्ति से तय नहीं होती, बल्कि उन खनिज संसाधनों से भी निर्धारित होती है जिनसे विद्युत वाहन, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा भंडारण प्रणाली, रक्षा उपकरण, दूरसंचार और उन्नत प्रौद्योगिकी संचालित होती है।
भारत इन क्षेत्रों में तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तांबा और दुर्लभ मृदा तत्व जैसे अधिकांश महत्वपूर्ण खनिजों के लिए अभी भी आयात पर निर्भर है। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया विश्व के उन देशों में शामिल है जो इन प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं। ऐसे में दोनों देशों की साझेदारी केवल व्यापार नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई है।
हम आपको बता दें कि ऑस्ट्रेलिया के पास विश्व के सबसे बड़े लिथियम भंडारों में से एक है, जबकि यूरेनियम के वैश्विक भंडार का भी बड़ा हिस्सा वहीं मौजूद है। भारत अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है और स्वच्छ ऊर्जा, विद्युत वाहन तथा सेमीकंडक्टर निर्माण को नई गति देना चाहता है। इसलिए ऑस्ट्रेलिया के साथ स्थायी खनिज आपूर्ति व्यवस्था भारत की विकास यात्रा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा का दूसरा बड़ा आयाम रक्षा सहयोग है। भारत और ऑस्ट्रेलिया पहले ही समुद्री अभ्यास, रक्षा साझेदारी और क्वॉड समूह के माध्यम से लगातार निकट आए हैं। अब दोनों देश रक्षा उद्योग, समुद्री निगरानी, प्रौद्योगिकी साझेदारी और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में बढ़ रहे हैं। बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में जब आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा एक दूसरे से जुड़ चुकी हैं, तब यह साझेदारी भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करेगी।
प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया यात्राओं को यदि एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार नहीं कर रहा, बल्कि पूरे इंडो पैसिफिक क्षेत्र में एक व्यापक रणनीतिक ताना बाना तैयार कर रहा है। इंडोनेशिया भारत को समुद्री पहुंच और सामरिक गहराई देता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। एक ओर समुद्री मार्गों पर मजबूत उपस्थिति है तो दूसरी ओर उद्योग, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक खनिजों की दीर्घकालिक उपलब्धता। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा श्रृंखला भारत की बदलती वैश्विक भूमिका का स्पष्ट संकेत है।
बहरहाल, समुद्री शक्ति, संसाधन सुरक्षा, विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला, सांस्कृतिक विरासत और रणनीतिक साझेदारी को एक साथ जोड़ते हुए भारत अब इंडो पैसिफिक में केवल सहभागी नहीं, बल्कि भविष्य की शक्ति संरचना को आकार देने वाले प्रमुख देशों में अपनी जगह मजबूत करता दिखाई दे रहा है।




