रायपुर। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई को छू लेना ही एवरेस्ट फतह नहीं माना जाता, बल्कि उस ऊंचाई को छूकर सकुशल लौटने वाले को ही वास्तविक एवरेस्ट विजेता कहा जाता है। यह कठिन परीक्षा हाल ही में छत्तीसगढ़ की बेटी अमिता श्रीवास ने भी पूरी की। अमिता के लिए यह सफर केवल बर्फीली चोटियों को पार करने का नहीं, बल्कि मौत को बेहद करीब से देखने का भी था।एवरेस्ट फतह करने वाली अमिता श्रीवास की कहानी किसी संपन्न परिवार से नहीं, बल्कि जांजगीर-चांपा जिले के एक अत्यंत गरीब और विपरित परिस्थितियों से शुरू होती है। उनके पिता जैतराम श्रीवास चांपा के लोहारपारा में एक छोटी-सी सैलून चलाते हैं, उसी आय से उन्होंने पांच बेटियों और दो बेटों का पालन-पोषण हुआ।
वर्ष 2008 में उन्होंने शासकीय लक्ष्मीबाई गर्ल्स स्कूल, चांपा से बारहवीं उत्तीर्ण की और इसके बाद बी.कॉम की पढ़ाई पूरी की। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, इसलिए वर्ष 2011 में वे आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बन गईं।
चांपा नगर पालिका के वार्ड 4 में छोटे से आंगनबाड़ी भवन में नन्हें मुन्ने बच्चों को संभालते हुए अमिता अक्सर अपने भविष्य के सपने बुनती थीं। उनकी नजर अक्सर कुछ दूर स्थित अटल बिहारी वाजपेयी ताप विद्युत संयंत्र, मड़वा पर पड़ती थी। उन्हें कल्पना भी नहीं थी कि एक दिन यही विद्युत परियोजना उनके पर्वतारोहण के सपनों को नई उड़ान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी का यह इस ताप विद्युत केवल बिजली पैदा नहीं करता, बल्कि अपने कोरे में पल रही बेटी अमिता श्रीवास के सपनों को भी नई ऊर्जा दे रहा है। किसी औद्योगिक परियोजना का लाभ स्थानीय लोगों के जीवन को कैसे नई दिशा दे सकता है, अमिता इसका सशक्त उदाहरण हैं।
वैसे तो अमिता श्रीवास की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर्वतारोही वाली नहीं रही है, परन्तु पहली बार उनकी सहेली क्षमा राजपूत के साथ माउंट आबू में उन्होंने पर्वतारोहण का अनुभव लिया और वहीं से ऊंचे पर्वतों को लांघने के बड़े सपने देखने लगी।
सपने को मंजिल तक पहुंचाने के लिए उन्होंने वर्ष 2018 में पर्वतारोहण का बेसिक कोर्स किया। इसके बाद सिक्किम में 28 दिन के एडवांस पर्वतारोहण प्रशिक्षण में प्रवेश मिला। महज कुछ हजार रुपये का मानदेय पाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के लिए प्रशिक्षण की फीस जुटाना आसान भी नहीं था। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और किसी तरह प्रशिक्षण पूरा किया।
पर्वतारोहण के सफर में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब उन्हें अफ्रीका के सबसे ऊंचे पर्वत किलिमंजारो अभियान का हिस्सा बनने का मौका मिला। इस अभियान में भाग लेने के लिए पैसे नहीं थे, इतनी बड़ी राशि जुटाना उनके लिये किसी पर्वत पर चढ़ने से कम कठिन नहीं था। उन्होंने कलेक्टर चांपा से किया, जिनके जरिये जनरेशन कंपनी ने पहली बार उनकी यात्रा के लिए फंड दिया।
यह सहयोग अमिता के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस मौके को अमिता ने पूरी निष्ठा और अनुशासन के साथ साधा। उनके ही गांव के श्री रमेश कुमार श्रीवास, जो छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में मुख्य सांख्यिकी अधिकारी के पद पर कार्यरत् हैं। वे बताते हैं कि अमिता ने बहुत कठिनाइयों में मेहनत की। सुबह-सुबह उन्हें अभ्यास करते हुए मिलती थी तो उसके पैर में जूते तक नहीं होते थे। इतने अभावों के बाद भी उसकी लक्ष्य पाने के लिए जीवटता सबके लिए सीखने लायक है।
कठोर शारीरिक और मानसिक तैयारी का परिणाम यह रहा कि 8 मार्च 2021 को विश्व महिला दिवस के अवसर पर उन्होंने अफ्रीका के किलिमंजारो माउंट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की और छत्तीसगढ़ की पहली अंतरराष्ट्रीय महिला पर्वतारोही बनने का गौरव हासिल किया। यह केवल एक पर्वत की जीत नहीं थी, बल्कि उस विश्वास की जीत थी कि सीमित संसाधन भी बड़े सपनों की राह नहीं रोक सकते।
इस सफलता के बाद अमिता का सफर यहीं नहीं रुका। उनके सामने अब दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की चुनौती थी। लेकिन इस अभियान के लिए भी 50 लाख रुपए के फीस की आवश्यकता थी। राज्य शासन और कलेक्टर की अनुशंसा पर छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी ने उन्हें काफी वित्तीय सहायता प्रदान की।
एवरेस्ट के लिए 9 अप्रैल को ट्रेन से दिल्ली के लिये निकली, वहां से काठमांडू और एवरेस्ट के बेस कैंप पहुंची। उनकी पहली चुनौती तब आयी जब 6500 मीटर की ऊंचाई पर मौसम खराब होने के कारण यात्रा ही स्थगित थी।
छत्तीसगढ़ के गोंद के लड्डू, ठेठरी, खुरमी और सलौनी खाकर समय बिताया। कुछ दिन इंतजार के बाद यात्रा शुरू हुई। कड़ाके की ठंड, बर्फीली हवाएं, बेहद कम ऑक्सीजन और हर कदम पर मौत का खतरा-यही उस यात्रा की वास्तविक पहचान थी।
रातभर धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ता था। रास्ते में कई पर्वतारोहियों के शव दिखाई देते थे, जो इस अभियान की कठिनाई का मौन प्रमाण थे। कुछ ऊंचाई को पार करने में ही पूरा दिन निकल जाता था।
एवरेस्ट अभियान के दौरान सबसे भयावह क्षण तब आया, जब उनके सामने ही बेंगलुरु के पर्वतारोही संदीप आरे स्नो ब्लाइंडनेस (Snow Blindness) का शिकार हो गए। वैसे वे काफी हष्ट-पुष्ट थे, लेकिन सूरज की पराबैंगनी किरणें संदीप की आंखों में पड़ी तो उनका कार्नियां डेमेज हो गई। बहुत अधिक कराहते हुए संदीप को देखा। बाद में पता चला की उनकी मौत हो गई है।
अभी अमिता इस सदमे से उबर भी नहीं पाई थीं कि एक और हादसे ने पूरे अभियान दल को झकझोर दिया। हैदराबाद के पर्वतारोही अरूण तिवारी की एवरेस्ट शिखर से महज 100 मीटर पहले अचानक मौत हो गई। इतनी बड़ी त्रासदी के बावजूद अमिता का हौसला नहीं टूटा। उनके शेरपा दावा गैल्जिन उनका उत्साह बढ़ाते रहे और एवरेस्ट फतह करने का संकल्प याद दिलाते रहे।
22 मई 2026 को उन्होंने समुद्र तल से 8848 मीटर (29,031 फीट) की ऊंचाई पर स्थित विश्व की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया। उस क्षण उन्होंने केवल एवरेस्ट ही नहीं जीता था, बल्कि उन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की थी, जिन्होंने बचपन से उनके रास्ते कठिन बनाए थे।
लेकिन पर्वतारोहियों की दुनिया में असली जीत शिखर पर पहुंचना नहीं, बल्कि वहां से सकुशल लौटना माना जाता है।
अमिता के अनुसार एवरेस्ट से उतरना, चढ़ाई से कहीं अधिक कठिन था। शिखर तक पहुंचने का उत्साह आगे बढ़ने की शक्ति देता है, लेकिन वापसी के दौरान वही शरीर पूरी तरह थक चुका होता है और एक छोटी-सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। ऑक्सीजन की कमी के कारण शरीर और मस्तिष्क में तालमेल नहीं रहता। कुछ याद नहीं रहता कि कहां पहुंचे, कितना चले।
उतरते वक्त एक ऐसे ही यात्री से उनकी मुलाकात हुई, जो थककर चूर हो गए थे और निढाल पड़े थे। उनके शेरपा दावा गैल्जिन ने उस पर्वतारोही का हौसला बढ़ाया और अपने साथ चलने कहा। परन्तु वहां शिखर के रास्ते में कुछ मिनट रूकना भी बहुत कठिन और जानलेवा होता है। धीरे-धीरे अमिता बढ़ते रही। आक्सीजन इतना कम था कि उनकी याददाश्त भी साथ नहीं दे रही थी। उन्हें इसके आगे की कठिनाई याद भी नहीं है।
कठिन संघर्ष के बाद 42 दिन बाद किसी तरह अमिता बेस कैंप तक पहुंचीं। पहुचंने के बाद एक और समस्या ने अमिता को घेर लिया। लगातार बर्फीले वातावरण से उनकी उंगली गलने लग गई थी। इसे फ्रॉस्टबाइट कहा जाता है। अमिता को बेस कैंप से आनन-फानन में हेलीकॉप्टर के जरिये काठमांडू लाया गया, जहां लगभग एक सप्ताह तक उपचार चला। स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद वे भारत लौटीं। अपने घर लौटकर अमिता के चेहरे पर गर्व के साथ अपने सपने के पूरे होने का सुकून नजर आता है।
एवरेस्ट की चोटी पर फहराया गया तिरंगा केवल एक पर्वतारोहण अभियान की सफलता नहीं है। यह उस छत्तीसगढ़ी बेटी के अदम्य साहस, संघर्ष और संकल्प की कहानी है, जिसने अभावों को अपनी मंजिल के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।
यह कहानी बताती है कि सपनों की ऊंचाई आर्थिक परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उन्हें पूरा करने के साहस से तय होती है। जब व्यक्तिगत जिद, कठोर परिश्रम और संस्थागत सहयोग साथ आ जाएं, तब चांपा की एक साधारण बेटी भी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचकर पूरे प्रदेश का मस्तक गर्व से ऊंचा कर सकती है।




